| Jan 01, 1970 | Daily Report |
| RISING BHARAT | News Count (103034) | |
20721. लाखों की नौकरी छोड़ ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी शुरू की, एक सीजन में 12 लाख रु. की कमाई, 5 लोगों को रोजगार भी दिया
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
Dainik Bhaskar
|
- अच्छे किस्म की अमरूद के पौधे लगभग एक साल में तैयार हो जाते हैं, पहले साल में एक पौधे से 6-7 किलो तक अमरूद निकलता है, उसके कुछ समय बाद 10-12 किलो तक उत्पादन होने लगता है
- आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है, मुंबई, पुणे, सांगली सहित कई शहरों में वे अमरूद भेजते हैं, हर दिन 10 हजार रु की कमाई हो रही है
- शीतल आज 4 एकड़ जमीन पर अमरूद उगा रहे हैं। 5 लोग उनके साथ काम करते हैं। हर एकड़ में 10 टन अमरूद निकलता है। अभी तीन प्रमुख किस्म ललित, जी बिलास और थाईलैंड पिंक का उत्पादन होता है। ललित की साइज छोटी होती है, जबकि जी बिलास और थाईलैंड पिंक का साइज बड़ा होता है।
20722. इंजीनियर ने नौकरी छोड़ चुनी खेती, शुरू की जीरो बजट फार्मिंग, गोबर से बनाते हैं कीटनाशक
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
The Better India
|
- मेरठ के कमल प्रताप तोमर ने शुरूआत में छह बीघा जमीन पर जीरो बजट खेती की लेकिन अब वह 12 बीघे में खेती कर रहे हैं।मेरठ के नजदीक सिसौली गाँव के कमल ने 2012 में बीटेक करने के बाद कुछ दिन नौकरी भी की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस टेस्ट दिया। कामयाब हुए, लेकिन उन्होंने आगे की पढ़ाई नहीं की। इसके बाद उन्होंने खेती की शुरूआत की।
- 32 वर्षीय कमल बताते हैं कि उनकी खेती का आधार गाय है। वह कहते हैं, “एक देसी गाय से इतना गोबर मिल जाता है कि पूरे साल बाजार से खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। देसी गाय के एक ग्राम गोबर में तीन सौ से लेकर पांच सौ करोड़ तक माइक्रो बैक्टीरिया पाए जाते हैं। यह खेती के लिए बेहद आवश्यक है। गाय के गोबर और गोमूत्र से कई खाद बनाई जाती है। इसके साथ ही कीटनाशक भी तैयार किए जाते हैं। इनका मकसद कीटों को खत्म करना नहीं, क्योंकि शत्रु कीट होते हैं तो ढेरों मित्र कीट भी होते हैं। यह कीटनाशक शत्रु कीट को फसल खराब करने से रोकते हैं।”
- कमल खेती के लिए जैविक खाद जीवामृत भी खुद ही तैयार करते हैं। दरअसल जीवामृत सुभाष पालेकर जी द्वारा सुझाया गया बहुत ही आसान और किफायती तरीका है, जिसके जरिए किसान घर पर ही जैविक खाद बना सकते हैं।”
20723. एक किसान, तीन काम: हल्दी की खेती, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से लाखों का मुनाफा
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
The Better India
|
- गुजरात के भाविक ने मात्र 5 बीघा ज़मीन से हल्दी की जैविक खेती शुरू की थी और आज वह 50 बीघा में हल्दी उगा रहे हैं और प्रोसेसिंग करके लगभग 5 टन हल्दी पाउडर भी बना रहे हैं!
- गुजरात के सारंगपुर गाँव में रहने वाले 30 वर्षीय भाविक खचर पिछले 6 सालों से हल्दी की जैविक खेती कर रहे हैं। हल्दी उगाने के साथ-साथ वह प्रोसेसिंग भी खुद ही करते हैं। वह इन दिनों हल्दी की फसल और पाउडर, दोनों से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
- भाविक जैविक तरीकों से खेती करने वालों के एक समूह से भी जुड़ गए। किसानों के इस नेटवर्क के ज़रिए ही उन्हें इज़रायल जाने का मौका मिला। वहाँ उन्होंने प्रोसेसिंग के बारे में जाना। वह बताते हैं कि इज़रायल दौरे में उनकी मुलाक़ात वहाँ के अग्रणी किसानों से हुई। उन्होंने देखा कि कैसे वहाँ किसान खुद ही अपनी फसल में वैल्यू ऐड करके और पैकिंग करके बेचते हैं। इससे उन्हें ज्यादा कमाई मिलती है।
20724. गुरुग्राम जैसे शहर में घर को बनाया अर्बन फार्म, पूरे साल उगातीं हैं तरह-तरह की सब्जियां
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
The Better India
|
- हर किसी को गार्डनिंग का शौक नहीं होता है लेकिन कुछ ऐसी परिस्थति बनती है कि ऐसे लोग भी बागवानी की शुरूआत कर देते हैं। ऐसी ही कहानी हरियाणा के गुरुग्राम में रहने वाली रूचिका की है। उन्होंने जब आसपास के लोगों को गार्डनिंग करते हुए देखा और उन्हें महसूस हुआ कि बाजार से वह जो कुछ भी सब्जी लाती हैं, वह ऑर्गेनिक नहीं है तो उन्होंने भी किचन गार्डन की शुरूआत कर दी।
- रूचिका के गार्डन में आपको हर मौसम में सब्जी मिल जाएगी। फिलहाल, वह सर्दियों की सब्जियों के लिए अपने गार्डन को तैयार कर रही हैं। रुचिका कहती हैं, “2-3 तरह की मूली, 2 -3 किस्म की गाज़र (लाल, पीली, काली), हरी मिर्च, काली मिर्च, फूलगोभी, ब्रोकॉली, सलाद की लगभग 15 किस्में, पुदीना, तुलसी, धनिया, पार्सले, पत्तागोभी, चकुंदर, सरसों, बीन्स आदि अपने गार्डन में उगाती हूँ। इसके अलावा 15-16 किस्म के फूल के पौधे भी हैं।”
- अपने पूरे गार्डन की देखभाल रूचिका खुद करती हैं। उनका कहना है कि उनके घर से बहुत ही कम कोई कचरा बाहर जाता है, वह रीसाइक्लिंग, रियूजिंग और कम्पोस्टिंग में विश्वास करती हैं। उनके किचन का सारा वेस्ट खाद और बायोएंजाइम बनाने में इस्तेमाल होता है। यहाँ तक कि उनके गार्डन का भी जो वेस्ट होता है जैसे सूखे पत्ते या फिर पुराने मौसम के सब्जियों के पौधे, बेल जिनसे हार्वेस्ट ले ली गई है और जिन्हें अब निकालना है- सभी कुछ को वह बायोएंजाइम बनाने में इस्तेमाल कर लेती हैं।
20725. पेशे से डॉक्टर, लेकिन खेती के लिए जुनून ऐसा कि वियतनाम में किसान के घर रहकर ड्रैगन फ्रूट उगाना सीखा, 30 हजार पौधे लगाए, हर साल 1.5 करोड़ रुपए कमाई
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
Dainik Bhaskar
|
- अभी डॉ. श्रीनिवास 12 एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं, करीब 30 हजार प्लांट्स हैं, 80 टन तक का प्रोडक्शन करते हैं
- डॉ. श्रीनिवास 200 से ज्यादा किसानों को ड्रैगन फ्रूट उगाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं, वे कहते हैं कि एक एकड़ जमीन से किसान 5-8 लाख रु तक कमा सकते हैं
- श्रीनिवास कहते हैं, 'पहली बार ड्रैगन फ्रूट साल 2016 में देखा। उनके भाई एक पारिवारिक आयोजन के लिए ड्रैगन फ्रूट लेकर आए थे। मुझे यह फ्रूट पसंद आया और इसके बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। फिर मैंने इसको लेकर रिसर्च करना शुरू किया कि यह कहां बिकता है, कहां से इसे इम्पोर्ट किया जाता है और इसकी फार्मिंग कैसे होती है।'
20726. Jharkhand: तीखी मिर्च की खेती से मालामाल हो रहे यहां के किसान, हर सप्ताह 20 हजार रुपये तक की कर रहे कमाई
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
Dainik Jagran
|
- पूर्वी सिंहभूम जिले के किसान अब पारंपरिक खेती में कम लाभ देखकर नई-नई फसल की खेती करने मे लगे हैं। हरी सब्जियों की खेती के लिए विख्यात पटमदा प्रखंड के किसान अब मिर्च की खेती कर अच्छा लाभ कमा रहे
- पटमदा प्रखंड के राखडीह निवासी किसान प्रहलाद महतो अन्य किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। दैनिक जागरण से बातचीत करते हुए प्रहलाद महतो ने बताया कि गांव में हरी मिर्च की खेती लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
- उनके साथ ही गावं के संतोष महतो, सुधीर महतो और उसके परिवार द्वारा मिर्च की खेती के लिए अपनाई तकनीक और मेहनत ने पूरे परिवार को लाल व मालामाल कर दिया है। प्रत्येक किसान सप्ताह में दो क्विंटल मिर्च बेचकर 20 हजार रुपये कमा रहे हैं।
20727. नौकरी छोड़ गांव वालों के साथ हैंडीक्राफ्ट का ऑनलाइन बिजनेस शुरू किया, एक करोड़ रु टर्नओवर, 800 कारीगरों को भी मुनाफा
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Self -Reliance
Hindi
India
Dainik Bhaskar
|
- मध्यप्रदेश के भोपाल के रहने वाले सुमिरन पांड्या ने कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग की है। अभी अहमदाबाद में हैंडमेड क्राफ्ट का ऑनलाइन स्टोर चलाते हैं। देश के साथ-साथ विदेशों में भी उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। हर महीने 400-500 प्रोडक्ट के ऑर्डर आते हैं। सालाना एक करोड़ रुपए की कमाई हो रही है।
- हम अलग-अलग गांवों में जाते थे और वहां के कारीगरों से मिलते थे, उनके काम को देखते थे, उसकी पूरी प्रोसेस समझते थे। इस तरह हमने कई गांवों का दौरा किया। उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। हैंडमेड प्रोडक्ट और उनकी खूबियों को जानने का मौका मिला।
- इसके बाद हमने गाथा नाम से एक ब्लॉग बनाया। हम जहां भी जाते थे, वहां के हैंडमेड क्राफ्ट और उसे बनाने वाले के बारे में स्टोरी तैयार करके उसे ब्लॉग पर पोस्ट करते थे। उस समय सोशल मीडिया और इंटरनेट का इतना क्रेज नहीं था। फिर भी काफी लोगों ने हमारी स्टोरी को पसंद किया। कई लोगों ने हमें कॉल व मैसेज कर प्रोडक्ट के बारे में जानकारी मांगी। कई लोगों ने कहा कि वे इस प्रोडक्ट को खरीदना चाहते हैं।
20728. Dehradun Ecologist’s Home Hasn’t Got an Electricity or Water Bill in 3 Years
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Self -Reliance
English
India
The Better India
|
- With practices like waste management, driving an electric car, growing organic food in her front yard and harnessing rainwater and sun, Soumya and her family in Dehradun have switched to a sustainable lifestyle that is not only a relief to her pocket but also the environment.
- Instead of constructing a new house or shifting into a flat, Soumya and her husband, Dr Raman Kumar decided to restore a 60-year-old house. In the process, they vowed to not send construction waste to the dump yard. All the debris was reused to lay the foundation of other buildings.
- The underground rainwater harvesting tank in the home can store up to 20,000 litres of rainwater – that suffices the needs of 6-7 people. The captured rainwater is filtered and then used for potable and non-potable needs. The family has stopped taking water from the administration completely. The surplus water recharges groundwater tables.
20729. ज़ोमाटो डिलीवरी बॉय ने बना दी इलेक्ट्रिक-सोलर साइकिल, इसी से करते थे इको-फ्रेंडली डिलीवरी
Innovation and startups, ISRO/Defense/Water infrastructure/EV and other sectors
->
Innovations in Bharat
Hindi
India
The Better India
|
- 19 वर्षीय इंद्रजीत ग्रेजुएशन के छात्र हैं लेकिन इसके साथ ही, उनकी एक और पहचान है और वह है एक आविष्कारक-उद्यमी की। बचपन से ही मशीनों को समझने और बनाने के शौक़ीन रहे इंद्रजीत ने अब तक कई ऐसे आविष्कार किए हैं जो जनसाधारण के लिए मददगार हैं। पहले तो उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों की पैदल आने-जाने की समस्या को समझते हुए सोलर साइकिल बनाई और फिर गाँव में चिरौंजी के किसानों की मदद के लिए पोर्टेबल चिरोंजी डेकोर्टिकेटर मशीन भी बनाई है।
- पुरानी साइकिल और सेकंड हैंड चीज़ें इस्तेमाल कर बनी उनकी सोलर साइकिल में उस समय लगभग तीन हज़ार रूपये की लागत आयी थी। उन्होंने साइकिल को इस तरह मॉडिफाइड किया कि यह सोलर और इलेक्ट्रिक दोनों तरीके से चल सके। सोलर पैनल के साथ यह साइकिल 30 किमी प्रतिघंटा के हिसाब से चलती है और बतौर इलेक्ट्रिक, एक चार्जिंग में यह साइकिल (Solar cum Electric Bicycle ) लगभग 60 किमी तक चल सकती है।
- इंस्पायर अवॉर्ड जीतने के बाद उन्हें जापान के Sakura Exchange Program in Science में भी जाने का मौका मिला। हालाँकि, इतने सम्मान मिलने के बाद भी उन्हें कहीं से कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाई। न ही उनके इनोवेशन को आगे बढ़ाने के लिए और न ही उनकी पढ़ाई के लिए।
20730. बैंक की नौकरी छोड़ बने किसान, लाखों किसानों को पहुँचा रहे लाभ
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
->
Agriculture(Organic Farming)
Hindi
India
The Better India
|
- इसी को देखते हुए बिहार के औरंगाबाद जिले के बरौली गाँव के रहने वाले अभिषेक ने साल 2011 में एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल की नौकरी को छोड़कर, अपने गाँव में खेती करने का फैसला किया। तब उनकी सैलरी 11 लाख रुपए प्रति वर्ष थी।फिलहाल, वह अपने 20 एकड़ पैतृक जमीन पर धान, गेहूँ जैसे परम्परागत फसलों के अलावा, तुलसी, लेमनग्रास, रजनीगंधा, गिलोय, जरबेरा, मोरिंगा, गेंदा फूल जैसे कई सुगंधित और औषधीय पौधों की प्राकृतिक रूप से खेती करते हैं, जिससे उन्हें हर साल 20 लाख रुपए से अधिक कमाई होती है।
- अभिषेक को खेती कार्यों में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 2014 में बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर से सर्वश्रेष्ठ किसान का अवार्ड मिला था। इसके अलावा 2016 में उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया था।
- अभिषेक कहते हैं, “मैं अपने जमीन के लगभग एक चौथाई हिस्से में औषधीय पौधों की खेती करता हूँ। औषधीय पौधों की खेती मैंने इस विचार के साथ शुरू किया, क्योंकि इसे एक बार लगाने के बाद 2-3 वर्षों तक सोचना नहीं पड़ता है। साथ ही, इनकी पत्तियां भारी बारिश और ओलावृष्टि में भी बर्बाद नहीं होती हैं और यदि 20-25 दिनों के बाद भी पानी मिले तो ये पौधे सक्षम होते हैं।”